Tuesday, April 8, 2014

Rama Vaara Nama Japa Vidhi



The Agasthiar Way - Rama Vaara Nama Japa Vithi

Vaara - day of the week
Nama - name
Japa - meditation/chanting
Vithi - procedure
Monday — Sree Ram Jaya Ram Siva Ram
Tuesday — Sree Ram Jaya Ram Jaya Jaya Ram
Wednesday — Hari Rama Hari Rama Rama Rama Hari Hari
Thursday — Jaya Rama Siva Rama Guru Rama Jaya Rama
Friday — Seetha Rama Hanumantha Rama Seetha Hanumantha
Saturday — Sree Ram Jaya Ram Sundara Ram
Sunday — Sree Ram Jaya Ram Raghu Ram
The Wish Fulfilling Mantra - Sree Ram Jaya Ram Kódhanda Ram

राम-राज्य : आदर्श राज्य





राम-राज्य : आदर्श राज्य
  रामावतार को लाखों वर्ष हो गये लेकिन श्रीरामजी अभी भी जनमानस के हृदय-पटल से विलुप्त नहीं हुए। क्यों? क्योंकि श्रीरामजी का आदर्श जीवन, उनका आदर्श चरित्र हर मनुष्य के लिए अनुकरणीय है। एक आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति, आदर्श पिता, आदर्श शिष्य, आदर्श योद्धा और आदर्श राजा के रूप में यदि किसीका नाम लेना हो तो भगवान श्रीरामजी का ही नाम सबकी जुबान पर आता है। इसीलिए राम-राज्य की महिमा आज लाखों-लाखों वर्षों के बाद भी गायी जाती है।
भगवान श्रीरामजी के सद्गुण ऐसे तो विलक्षण थे कि पृथ्वी के प्रत्येक धर्म, सम्प्रदाय और जाति के लोग उन सद्गुणों को अपनाकर लाभान्वित हो सकते हैं।
श्रीरामजी सारगर्भित बोलते थे। उनसे कोई मिलने आता तो वे यह नहीं सोचते थे कि पहले वह बात शुरू करे या मुझे प्रणाम करे। सामनेवाले को संकोच न हो इसलिए श्रीरामजी अपनी तरफ से ही बात शुरू कर देते थे। श्रीरामजी दूसरों की बात बड़े ध्यान व आदर से सुनते थे। बोलनेवाला जब तक अपने और औरों के अहित की बात नहीं कहता, तब तक वे उसकी बात सुन लेते थे। जब वह किसीकी निंदा आदि की बात करता तब देखते कि इससे इसका अहित होगा या इसके चित्त का क्षोभ बढ़ जायेगा या किसी दूसरे की हानि होगी, तब वे सामनेवाले की बातों को सुनते-सुनते इस ढंग से बात मोड़ देते कि बोलनेवाले का अपमान नहीं होता था।
युद्ध के मैदान में श्रीरामजी एक बाण से रावण के रथ को जला देते, दूसरा बाण मारकर उसके हथियार उड़ा देते फिर भी उनका चित्त शांत और सम रहता था। वे रावण से कहते : ‘लंकेश! जाओ, कल फिर तैयार होकर आना।’ऐसा करते-करते काफी समय बीत गया तो देवताओं को चिंता हुई कि रामजी को क्रोध नहीं आता है, वे तो समता-साम्राज्य में स्थिर हैं, फिर रावण का नाश कैसे होगा? लक्ष्मणजी, हनुमानजी आदि को भी चिंता हुई, तब दोनों ने मिलकर प्रार्थना की : ‘प्रभु! थोड़े कोपायमान होइये।’तब श्रीरामजी ने क्रोध का आवाहन किया : क्रोधं आवाहयामि। ‘क्रोध! अब आ जा।’
श्रीरामजी क्रोध का उपयोग तो करते थे किंतु क्रोध के हाथों में नहीं आते थे। हम लोगों को क्रोध आता है तो क्रोधी हो जाते हैं, लोभ आता है तो लोभी हो जाते हैं, मोह आता है तो मोही हो जाते हैं, शोक आता है तो शोकातुर हो जाते हैं लेकिन श्रीरामजी को जिस समय जिस साधन की आवश्यकता होती थी, वे उसका उपयोग कर लेते थे। श्रीरामजी का अपने मन पर बड़ा विलक्षण नियंत्रण था। सामनेवाला व्यक्ति अपने ढंग से सोचता है, अपने ढंग से जीता है, अतः वह आपके साथ अनुचित व्यवहार कर सकता है परंतु उसके ऐसे व्यवहार से अशांत होना-न होना आपके हाथ की बात है। यह जरूरी नहीं है कि सब लोग आपके मन के अनुरूप ही जियें।
श्रीरामजी अर्थव्यवस्था में भी निपुण थे। ‘शुक्रनीति’ और ‘मनुस्मृति’ में भी आया है कि जो धर्म, संग्रह, परिजन और अपने लिए - इन चार भागों में अर्थ की ठीक से व्यवस्था करता है वह आदमी इस लोक और परलोक में सुख-आराम पाता है। कई लोग लोभ-लालच में इतना अर्थसंग्रह कर लेते हैं कि वही अर्थ उनके लिए अनर्थ का कारण हो जाता है और कई लोग इतने खर्चीले हो जाते हैं कि कमाया हुआ सब धन उड़ा देते हैं, फिर कंगालियत में जीते हैं। श्रीरामजी धन के उपार्जन में भी कुशल थे और उपयोग में भी। जैसे मधुमक्खी पुष्पों को हानि पहुँचाये बिना उनसे परागकण ले लेती है, ऐसे ही श्रीरामजी प्रजा से ऐसे ढंग से कर (टैक्स) लेते कि प्रजा पर बोझ नहीं पड़ता था। वे प्रजा के हित का चिंतन तथा उसके भविष्य का सोच-विचार करके ही कर लेते थे। प्रजा के संतोष तथा विश्वास-सम्पादन के लिए श्रीरामजी राज्यसुख, गृहस्थसुख और राज्यवैभव का त्याग करने में भी संकोच नहीं करते थे। इसीलिए श्रीरामजी का राज्य आदर्श राज्य माना जाता है।